रूटीन का रोना || आज से बन्द -
रूटीन का रोना अरे कुछ नहीं, बस रूटीन ! किसी ने हालचाल पूछा और हमने रूटीन को कोसना शुरू किया। हम उसे इतना ज्यादा कोसते हैं कि वह हमारी आदत का हिस्सा बन जाता है। हम अलग तरह की जिंदगी के सपने देखते हैं और रूटीन को कोसते रहते हैं। मेरा मानना है कि एक अलग तरह की जिंदगी जीनी है, तो भी रूटीन जरूरी है। हम अपनी ज्यादातर जिंदगी तो रूटीन के सहारे ही निकालते हैं। और उसी को अक्सर कोसते रहते हैं। हम एक गलतफहमी में जीते हैं कि रूटीन असल जिंदगी नहीं है। हम जो काम कर रहे हैं, उसमें असल मजा नहीं है। जिंदगी का लुत्फ तो कहीं और है। उसका मकसद और मंजिल कहीं और है। मजा कहीं और है। सार्थकता कहीं और है। यह मानकर हम अपनी जिंदगी के बड़े हिस्से को बेकार के खाते में डाल लेते हैं। रोजमर्रा के काम को हम ढर्रा मान लेते हैं, जिसमें किसी किस्म की 'क्रिएटिविटी' नहीं है। यह सोच ही ठीक नहीं है। आखिर हम अपनी जिंदगी के बड़े हिस्से को निरर्थक कैसे मान सकते हैं। हमें अपने रूटीन को कायदे से लेना चाहिए। हम जब अपने अब में रहते हैं, तो रूटीन को अहमियत देनी होती है। काम करने का तो वही पल होता है। उस पल को नकारकर काम कर ही...
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